27. September 2022
अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक सर्टिफिकेट कोर्स का हुआ शानदार समापन

अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक सर्टिफिकेट कोर्स का हुआ शानदार समापन

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वर्तमान जटिल हालात में अध्ययन-अध्यापन हेतु तकनीकी मददगार – प्रो. हरित्मा चोपड़ा

भारतीय बौद्धिक ज्ञानपरम्परा में स्त्रियों का गौरवपूर्ण स्थान है – प्रो. बलराम सिंह

प्राचीन गुरुकल प्रणाली में विद्यास्नातक एवं व्रतस्नातक दो तरह के अध्येता होते थे – नीलेश ओक

मैत्रेयी महाविद्यालय और अमेरिकी संस्थान इन्स्टीट्यूट ऑफ एड्वांस्ड साइंसेज के संयुक्त तत्वावधान में 17 अप्रैल, 2021 से चल रहे भारतीय भाषाओं एवं डिजिटल टूल्स पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक सर्टिफिकेट कोर्स का रविवार को सफल समापन हो गया। इसका जितना जानदार आगाज हुआ था, समापन भी उतना ही शानदार रहा। समापन समारोह दो दिन शनिवार एवं रविवार को दो अलग-अलग सत्रों में आयोजित हुआ। पहले दिन प्रतिभागियों ने सर्टिफिकेट कोर्स से जुड़े अपने अनुभव को साझा किया, जबकि दूसरे दिन गणमान्य विद्वानों के व्याख्यान हुए। इसमें मुख्य अतिथि के रूप में अमेरिका के इंस्टीट्यूट ऑफ एड्वांस्ड साइंसेज के डायरेक्टर प्रोफेसर बलराम सिंह, बतौर विशिष्ट अतिथि अमेरिका से ही श्री नीलेश नीलकण्ठ ओक सम्मिलित हुए जबकि मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर हरित्मा चोपड़ा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की।

समापन समारोह का शुभारम्भ संस्कृत शिक्षक डॉ. अनिरुद्ध ओझा के द्वारा प्रस्तुत वैदिक मंगलाचरण से हुआ। इसके बाद स्कूल ऑफ इण्डिक स्टडीज, अमेरिका में बतौर सहायक प्रोफ़ेसर कार्यरत डॉ. उमेश कुमार सिंह ने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, सत्राध्यक्ष एवं सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया। स्वागत वक्तव्य के पश्चात्‌ मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. हरित्मा चोपड़ा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सबसे पहले इस कोर्स के सफलतापूर्वक आयोजन में सहयोग देने के लिए इंस्टीट्यूट ऑफ एड्वांस्ड साइंसेज, यूएसए के प्रति आभार जताया। आगे उन्होंने कहा कि तकनीकी ने आज की विषम परिस्थितियों में अध्ययन-अध्यापन में आ रही चुनौतियों से लड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भाषा सम्बन्धी तकनीकी पर आधारित यह सर्टिफिकेट कोर्स सभी प्रतिभागियों के लिए अत्यन्त उपयोगी रहा। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि यह कोर्स नई शिक्षा नीति की प्रमुख दो अवधारणाओं – क्षेत्रीय भाषाओं एवं ब्लेण्डेड लर्निंग को बढ़ावा देना इन दोनों ही तथ्यों को समाहित किए हुए था। विशिष्ट अतिथि श्री नीलेश नीलकण्ठ ओक ने अपने उद्बोधन में प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का उल्लेख करते हुए विद्यास्नातक एवं व्रतस्नातक दो तरह के अध्येताओं के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया। साथ ही उन्होंने प्रतिभागियों से प्राचीन ज्ञान को नए नज़रिए से देखने एवं डेटा साइंस के आधार पर अपनी शोधदृष्टि को विकसित करने का आह्वान भी किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के आदर्श निकेतन विद्यालय के प्राचार्य कुलदीप कुमार बिश्नोई, मिराण्डा हॉउस में राजनीति विज्ञान की प्राध्यापिका डॉ. सुरभि, बनारस से डॉ. श्वेता द्विवेदी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शिक्षाशास्त्र में परास्नातक पाठ्यक्रम में अध्ययनरत छात्रा संस्कृति केशरी, संस्कृत स्नातक की छात्रा निहारिका खुराना, गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्रा रिज़वाना परवीन इत्यादि ने प्रतिभागी के रूप में अपना अनुभव साझा करते हुए इस कोर्स को अत्यन्त लाभप्रद व शानदार बताया तथा भविष्य में भी इसको जारी रखने की गुजारिश की।

इसी क्रम में कोर्स के संयोजक डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने प्रतिभागियों से प्राप्त फीडबैक का आंकलन प्रस्तुत किया, जिसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र इत्यादि 31 राज्यों से प्रतिभाग कर रहे प्रतिभागियों को यह कोर्स कैसा लगा, इससे सम्बन्धित उनके द्वारा प्रेषित सन्देश के साथ फीडबैक को दिखाया गया। जिसके अनुसार सौ फ़ीसदी प्रतिभागियों ने यह माना है कि इस कोर्स को करने से उनके भाषा से सम्बन्धित डिजिटल टूल्स के ज्ञान में बढ़ोतरी हुई तथा आगे इस क्षेत्र में अध्ययन-अध्यापन अथवा शोध करने में उन्हें आसानी होगी। सभी ने यह भी स्वीकार किया कि प्रस्तुत त्रैमासिक कोर्स भाषाओं के डिजिटल अध्ययन की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए प्रोफेसर बलराम सिंह ने कहा कि प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि यह कोर्स वाकई अत्यन्त सफल रहा है। इसके लिए उन्होंने आयोजन मण्डल की प्रशंसा की। उन्होंने प्राचीन भारतीय बौद्धिक ज्ञान परम्परा एवं प्राच्य ग्रन्थों के आधार पर नारी शक्ति का निरूपण करते हुए इसके वैज्ञानिक आधार को भी स्पष्ट किया। कार्यक्रम के अन्त में कोर्स क्वॉर्डिनेटर डॉ. ज्योति सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया जबकि डॉ. नुपुर चावला ने सत्र का संचालन किया।

गौरतलब है कि बारह मॉड्यूल वाले इस त्रैमासिक सर्टिफिकेट कोर्स में भारत के अलावा अमेरिका, मॉरीशस इत्यादि देशों से कुल मिलाकर सत्ताइस सौ से भी अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण किया था। इस कोर्स में सात अन्तर्राष्ट्रीय एवं पांच राष्ट्रीय तकनीकी एवं भाषा विशेषज्ञों के व्याख्यान हुए। इसके पहले मॉड्यूल में प्रो. गिरीश नाथ झा ने ‘संस्कृत एंड इंडियन लैंग्वेज : मेथड्स इन टेक्नोलॉजी डेवलपमेण्ट’ विषय पर अत्यन्त तार्किक व्याख्यान दिया। दूसरे एवं नौवें मॉड्यूल के वक्ता रहे अमेरिका के स्कूल ऑफ इण्डिक स्टडीज के सहायक प्रोफेसर एवं वैदिक अनुसंधाता डॉ. उमेश कुमार सिंह, जिन्होंने क्रमशः ’यूजिंग यूनिकोड फ़ॉर इंडियन लैंग्वेज’ तथा ‘यूज ऑफ लेटेक्स फ़ॉर रिसर्च पब्लिकेशन’ विषयों पर व्याख्यान दिया। तीसरे मॉड्यूल के वक्ता के रूप में विश्वभारती शान्तिनिकेतन, पश्चिम बंगाल के हिन्दी भवन पुस्तकालय एवं चीना भवन पुस्तकालय के अध्यक्ष श्री अजय कुमार शर्मा ने ‘गूगल टूल्स’ पर जबकि चौथे मॉड्यूल में मैत्रेयी महाविद्यालय की संगणक शिक्षिका डॉ. मंजू भारद्वाज ने ’इंटरनेट के आईसीटी टूल्स’ पर प्रकाश डाला। पांचवे मॉड्यूल में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से डॉ. सुभाष चन्द्र ने ‘मशीन ट्रांसलेशन’ पर महत्त्वपूर्ण  व्याख्यान दिया। छठा एवं सातवां मॉड्यूल एमएस ऑफिस पर आधारित रहा, जिसके अन्तर्गत जन्तुविज्ञानी डॉ. ज्योति सिंह ने एमएसवर्ड जबकि डॉ. ब्रोतोती रॉय ने पॉवर पॉइंट पर सविस्तर प्रकाश डाला। आठवें मॉड्यूल में अमेरिका के सुप्रसिद्ध इंडोलॉजिस्ट श्री नीलेश ओक ने ‘डेटा साइंस एंड इंडियन लैंग्वेज’ पर अतीव प्रभावशाली व्याख्यान दिया। इसमें उन्होंने भारतीय प्राचीन ज्ञान परम्परा पर आधुनिक विज्ञान के नज़रिए से दृष्टिपात करते हुए यह स्पष्ट किया कि डेटा साइंस का सर्वप्रथम प्रयोग महाभारत के नल-दमयन्ती कथा में किया गया है। ग्यारहवें मॉड्यूल में लेडी इर्विन महाविद्यालय में शिक्षाशास्त्र विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. संगीता सिंह ने ‘भाषापाठनप्रविधि एवं साइन लैंग्वेज’ विषय पर ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया जिसमें उन्होंने मूकबधिर लोगों के अध्ययन सम्बन्धी समस्या को रेखांकित करते हुए इसका समाधान भी प्रस्तुत किया। कोर्स के दसवें एवं बारहवे मॉड्यूल के वक्ता के रूप में कोर्स क्वॉर्डिनेटर एवं मैत्रेयी महाविद्यालय में संस्कृत के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रमोद कुमार सिंह का व्याख्यान हुआ। दसवें मॉड्यूल में डॉ. प्रमोद ने ‘एक्सेसिंग ई-रिसोर्सेज फ़ॉर इण्डियन लैंग्वेज’ विषय पर अतीव रोचक एवं उपयोगी व्याख्यान दिया। उन्होंने अपने प्रजेंटेशन में भारतीय भाषाओं से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण ई-रिसोर्सेज पर विस्तार से प्रकाश डाला। जबकि बारहवें मॉड्यूल में डॉ. सिंह ने ‘प्लेजरिजम : कॉन्सेप्ट एंड ट्र्बलशूटिंग इन इंडियन लैंग्वेज’ पर अपना व्याख्यान दिया, जो सभी प्रतिभागियों द्वारा अत्यंत प्रशंसित रहा। उन्होंने बताया कि प्लेजरिजम की सामान्य अवधारणा और नियम तो भारतीय भाषाओं के लिए भी समान ही हैं, किन्तु भारतीय भाषाओं में हो रहे शोध को जांचने की प्रक्रिया थोड़ी जटिल है। ये जटिलता और भी बढ़ जाती है, जब शोध या लेखन कार्य नॉन यूनिकोड फ़ॉन्ट्स में हुए हों। भारतीय भाषाओं एवं प्लेजरिजम से सम्बंधित तमाम पहलुओं पर उन्होंने प्रकाश डाला। साथ ही प्लेजरिजम की नई नियमावली और भारतीय भाषाओं में नॉन यूनीकोड फ़ॉन्ट्स से आगत समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत किया।

डेटा साइंस का सर्वप्रथम प्रयोग महाभारत के नल-दमयन्ती कथा में हुआ है – नीलेश ओक

यहाँ यह भी बताते चलें कि यह सर्टिफिकेट कोर्स मैत्रेयी महाविद्यालय के इनेबलिंग यूनिट के द्वारा आयोजित किया गया। इस कोर्स के संरक्षक थे इंस्टीट्यूट ऑफ एड्वांस्ड साइंसेज, यूएसए के संस्थापक प्रोफ़ेसर बलराम सिंह तथा कोर्स की डायरेक्टर थीं मैत्रेयी महाविद्यालय की प्राचार्या प्रोफेसर हरित्मा चोपड़ा। कोर्स के क्वॉर्डिनेटर के रूप में डॉ. प्रमोद कुमार सिंह, डॉ. उमेश कुमार सिंह एवं डॉ. ज्योति सिंह ने अपना योगदान दिया। साथ ही डॉ. स्मृति सिंह, डॉ. स्वस्ति शर्मा, डॉ. अनामिका सिंह, डॉ. गीता पाण्डेय, डॉ. नुपुर चावला, डॉ. सविता पाठक, और डॉ. अनिरुद्ध ओझा ने आयोजन-समिति के सदस्य के उत्तरदायित्व का निर्वहण किया।

सर्टिफिकेट कोर्स में कुल बारह मॉड्यूल रखे गए थे, जिसमें सात अन्तर्राष्ट्रीय एवं पांच राष्ट्रीय विद्वानों के व्याख्यान हुए। प्रतिभागियों हेतु कुल 26 सत्र आयोजित किए गए, जिसमें से 12 व्याख्यान सत्र, 08 अभ्यास सत्र, 03 शंका समाधान सत्र और उद्घाटन, समापन तथा परीक्षा-आयोजन हेतु एक-एक सत्र रखे गए। इस दौरान राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय विद्वानों द्वारा बनाए गए कुल चौबीस वीडियो ई-लेक्चर्स भी प्रतिभागियों को प्रदान किए गए।

 

 

Joanna Taylor


2 comments

  • Shane Murphy

    March 15, 2017 at 11:27 am

    Running a business with far less money than you should need isn\’t productive nor efficient.

    Reply

  • Kenny Perry

    March 15, 2017 at 11:31 am

    It can be done, believe me. Just need some common sense.

    Reply

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